राजनीति और समाज





आज हम बात करते है राजनीति पर जिस तरह से हमारे नेता ईमानदार अफसरों और सैनिकों के बारे में टिप्पणी कर रहे हैं, वह न केवल निंदनीय है, बल्कि भर्त्सना के योग्य है। विडंबना है कि देश को ईमानदार कर्मचारियों, कर्तव्यनिष्ठ अफसरों व देशभक्त सैनिकों की आवश्यकता है, वहीं हमारे ये सफेदपोश नेता भ्रष्टाचार में गले तक डूबे हुए हैं।
जबकि हमारे नेता गरीबी के सच्चे-झूठे आंकड़े पेश कर रहे हैं और जातिवाद के नाम पर राजनीति हो रही है। एक गठबंधन सत्ता बचाने में जुटा है, तो दूसरा सत्ता हासिल करने में। लेकिन किसी के पास जनता और देश के हित में कोई नीति नहीं है।



       धर्म की राजनीति

इस समय धर्म की राजनीति को लेकर तमाम सवाल, आरोप-प्रत्यारोप उठ रहे हैं.एक राजनीतिज्ञ को धार्मिक होना ज़रूरी है, धर्म के बिना समर्थ और सार्थक राजनीति नहीं हो सकती.हमारे राजनीतिज्ञ को राजनीति के धर्म का पालन करना होगा ऐसा न हो की धर्म की राजनीति ही की जाये । भारतीय राजनीति के इतिहास में देश की आज़ादी के बाद से अब तक जिस तरह से देश में राजनेताओं ने राजनीति की है, वह सोचनीय है एक राजनीति शास्त्र के विद्यार्थी होने के नाते जो कुछ मैं ने पढ़ा या समझा इस नतीजे पे पहुंचा के आज भारतीय राजनेता जो सत्ता पे आसीन हैं या फिर विपक्ष में राजनीति का धर्म एवंम सिद्धान्तों को भुला कर धर्म की राजनीति कर सत्ता पे कब्ज़ा जमाये हुए हैं।
क्या वह राजनीति के धर्म का हक अदा कर रहे हैं ?
भारत देश जिस ने पूरी दुनिया को (universal acceptance)का पाठ पढ़ाया हो जिस ने विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार किया हो। वह भारत देश जो कभी सोने की चिड़िया हुआ करता था जहाँ की गंगा, जमुना तेहज़ीब की दुहाई दी जाती थी, जहाँ विश्व् भर में सब से ज़्यादा भाषाएँ और धर्म में आस्था रखने वाले लोग रहते हों ,जहाँ की एकता और अखण्डता इतिहास रचता हो, जहाँ की सभ्यता को दूसरे देशों में मिसाल बताया जाता हो दरअसल भारत में राजनेताओं ने राजनीति का धर्म भुला कर अपनी ज़िम्मेदारी के क़र्ज़ को अपने से अलग कर दिया है।
क्यों किसी को हिंदुत्व खतरे में लगता है?
और धर्म की राजनीति करके देश या राज्य के सत्ता को हथिया कर मुख्या के रूप में आसीन होना चाहते हैं। देश का कोई भी नागरिक चाहे वह किसी भी समुदाय से हो किसी धर्म में आस्था रखता हो उसको देश में किसी भी तरह का दंगा फसाद खून खराबा स्वीकार नहीं होगा। जहाँ केवल मानवता और मासूम की जान जाती हो। क्या हम और आप ने कभी इस बारे में भी सोचा है की हमारी भावना संवेदना क्यों उन राजनेताओं के हाथों में है, जो कभी भी देश में शांति नहीं चाहते। क्यों किसी को हिंदुत्व खतरे में लगता है किसी को इस्लाम किसी को ईसाईयत खतरे में लगता है।


               मानवता का धर्म

मगर इन सारी बातों से इन सारे धर्मों से ऊपर जो मानवता का धर्म है उसकी फ़िक्र किसी को भी नहीं है। कहीं धर्म तो कहीं नस्लवाद की लड़ाई चल रही है।भारत में धर्म और नस्लवाल की लड़ाई को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता देश की जनता की आँखें तरस गयी इस बात के लिए की जिस नेता को अपना बहुमूल्य वोट दे कर  सत्ता तक पहुंचाया कभी वो जनता से किये गए वादों को पूरा करने हेतु सरकार से लड़ाई करता, कभी वो अपने क्षेत्र की जनता के लिए सस्ती शिक्षा,बेरोजगारी,स्वास्थ्य,बिजली,पानी जीवन सुरक्षा के मसले हल न होने के कारण अनशन करता।
धर्म को लेकर बहस छिड़ी हुई
आज देश के हर कोने में हर धर्म को लेकर बहस छिड़ी हुई है, इस लड़ाई में आज तक अनगिनत जानें जा चुकी हैं और न जाने कितनी और जानें जाती रहेगी।आज हर कोई मानवता के लिए बड़ी बड़ी बातें तो करता है, मगर कभी ईमानदारी से उसी मानवता की सेवा के लिए अपनी सोच बदलने की कोशिस की ? कभी नहीं क्योंकि हमारी मानसिकता में व्योहारवाद ही नहीं । हम एक ऐसे माहोल में जीते हैं जहां परम्पराओं को तोडक़र उस से आगे की सोचना हमारे आचरण में नहीं है.या अंधविश्वास की बंदिश से आज़ाद होना हमारे बस में नहीं , यही कारण है कि हम अपने असली धर्म और उसकी परिभाषा को भूल गए है।

आज से लगभग पाँच हजार वर्ष पहले कोई भी धर्म या अन्य सम्प्रदाय नहीं था। न हिन्दु, न मुसलिम, न सिक्ख और न ईसाई थे। केवल मानव धर्म था। सभी का एक ही मानव धर्म था और है। लेकिन जैसे-2 कलयुग का प्रभाव बढ़ता गया वैसे-2 हमारे में मत-भेद होता गया। कारण सिर्फ यही रहा कि धार्मिक कुल गुरुओं द्वारा शास्त्रों में लिखी हुई सच्चाई को दबा दिया गया। कारण चाहे स्वार्थ हो या ऊपरी दिखावा। जिसके परिणाम स्वरूप आज एक मानव धर्म के चार धर्म और अन्य अनेक सम्प्रदाएँ बन चुके हैं। जिसके कारण आपस में मतभेद होना स्वाभाविक ही है। सभी का प्रभु/भगवान/राम/अल्लाह/रब/गोड/खुदा/परमेश्वर एक ही है। ये भाषा भिन्न पर्यायवाची शब्द हैं। सभी मानते हैं कि सबका मालिक एक है लेकिन फिर भी ये अलग-अलग धर्म सम्प्रदाय क्यों ?
जीव हमारी जाति है, मानव धर्म हमारा ।
हिन्दु मुसलिम सिक्ख ईसाई, धर्म नहीं कोई न्यारा।
यह बात बिल्कुल ठीक है कि सबका मालिक/रब/खुदा/अल्लाह/गोड/ राम/परमेश्वर एक ही है जिसका वास्तविक नाम कबीर है और वह अपने सतलोक/सतधाम/सच्चखण्ड में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है। लेकिन अब हिन्दु तो कहते हैं कि हमारा राम बड़ा है, मुसलिम कहते हैं कि हमारा अल्लाह बड़ा है, ईसाई कहते हैं कि हमारा ईसामसीह बड़ा और सिक्ख कहते हैं कि हमारे गुरु नानक साहेब जी बड़े हैं। ऐसे कहते हैं जैसे चार नादान बच्चे कहते हैं कि यह मेरा पापा, दूसरा कहेगा यह मेरा पापा है तेरा नहीं है, तीसरा कहेगा यह तो मेरा पिता जी है जो सबसे बड़ा है और फिर चैथा कहेगा कि अरे नहीं नादानों! यह मेरा डैडी है, तुम्हारा नहीं है। जबकि उन चारों का पिता वही एक ही है। इन्हीं नादान बच्चों की तरह आज हमारा मानव समाज लड़ रहा है।
                                ‘‘कोई कहै हमारा राम बड़ा है, कोई कहे खुदाई रे।
  कोई कहे हमारा ईसामसीह बड़ा, ये बाटा रहे लगाई रे।
जबकि हमारे सभी धार्मिक पवित्र सदग्रन्थों व शास्त्रों में उस एक प्रभु/मालिक/रब/खुदा/अल्लाह/ राम/साहेब/गोड/परमेश्वर की प्रत्यक्ष नाम लिख कर महिमा गाई है कि वह एक मालिक/प्रभु कबीर साहेब है जो सतलोक में मानव सदृश स्वरूप में आकार में रहता है।

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